कश्मीरियों के बलिदान और संघर्ष का उदाहरण नहीं मिलता, अली गीलानी से लेकर लेकर मीरवाइज़ उमर फारूक तक, कोई भी लक्ष्य से भटका नहीं, लेकिन फिर भी कश्मीरियों को स्वतंत्रता का लक्ष्य नहीं मिला। भारत ने 1947 में आक्रमण करके कब्जा किया था, लेकिन पिछले साल 5 अगस्त को मोदी की कट्टरपंथी सरकार ने उसे पूरी तरह से हड़पने की भी कोशिश की।
भारत नियंत्रित कश्मीर में वर्षों से तालाबंदी चल रही थी, लेकिन पिछले साल से इसकी घेराबंदी की जा रही है जो समकालीन इतिहास में सबसे लंबी घेराबंदी है। एक समय था जब भारत नियंत्रित कश्मीर के मुसलमानों की आर्थिक और सामाजिक स्थिति पाकिस्तानियों की तुलना में बहुत बेहतर थी। उन्हें भारत की केंद्र सरकार और कश्मीर में भी पद दिया गया था।
सवाल यह है कि मौजूदा दौर में पाकिस्तान उनके लिए क्या कर सकता है? पाकिस्तान के लिए पहला रास्ता कश्मीर की आज़ादी के लिए हमला करना है लेकिन हमारे देश के शासक और रक्षक हमें बता रहे हैं कि यह संभव नहीं है क्योंकि एक ओर आर्थिक स्थिति पाकिस्तान को युद्ध से रोकती है और दूसरी ओर अंतर्राष्ट्रीय समुदाय न इस युद्ध की अनुमति देगा और न ही इस प्रकार के किसी युद्ध में पाकिस्तान का साथ देगा।
दूसरा विकल्प अधिकृत कश्मीर में स्वतंत्रता सेनानियों को नैतिक और व्यवहारिक समर्थन प्रदान करना हो सकता है, लेकिन 9/11 के बाद के माहौल और जिस तरह से भारत ने कश्मीरियों की स्वतंत्रता की लड़ाई को अलक़ायदा और तालिबान जैसे संगठनों के साथ जोड़ा है तब से, इस विकल्प को प्रयोग करना संभव नहीं रह गया, विशेषकर एफएटीएफ जैसे समझौतों की वजह से। तीसरा विकल्प जो उपलब्ध है वह कूटनीति के माध्यम से विश्व जनमत को कश्मीर के सिलसिले में जागरुक बनाना है जिसके लिए ज़रूरी है कि पाकिस्तान विश्व स्तर पर दुश्मनों को कम करे और दोस्तों की संख्या बढ़ाए, लेकिन वास्तविकता यह है कि वर्तमान सरकार, इसकी वर्तमान टीम और इसकी चरमपंथी नीतियों के साथ यह संभव ही नहीं है।
विश्व स्तर पर, कश्मीर मुद्दा जीवंत हुआ है, लेकिन यह हमारा नहीं है, बल्कि कश्मीरियों की मेहनत का परिणाम है जिन्होंने बलिदान दिया है और संघर्ष किया है या यह मोदी सरकार और उसकी नीतियों का परिणाम है। पूर्व डीजी आईएसपीआर मेजर जनरल आसिफ गफूर ने कहा था कि भारत ने हमें बाउंसर मारा है और अब हमारा काम है कि हम उस पर छक्का मारें लेकिन दुर्भाग्य से सूनामी सरकार उस पर एक भी रन न बना सकी। वर्तमान समय में, कश्मीर मुद्दे पर कुछ इस तरह से कार्यवाही होना चाहिए जो बाहरी दुनिया को प्रभावित करती है, लेकिन सरकार की हर गतिविधि पाकिस्तानियों को ही प्रभावित करने पर की केन्द्रित होती है।
कश्मीर में मोदी सरकार द्वारा किए गए अत्याचार और भारत में अल्पसंख्यकों के साथ दुर्व्यवहार पर दुनिया उसी समय हमारा साथ देगी जब हम पाकिस्तान के अंदर ऐसा कुछ नहीं करें जो हमें नैतिक रूप से कमजोर बनाए। अगर उनकी अदालतें अल्पसंख्यकों और कश्मीरियों को न्याय नहीं दे रही हैं, तो हमारी अदालतों को न्याय के उच्च मानक निर्धारित करने चाहिए, लेकिन अगर हमारी अदालतें राजनीतिक विरोधियों और हमारे नागरिकों को न्याय नहीं देती हैं, तो हम लाख चाहें दुनिया की नज़र में भारत को अपराधी नहीं साबित कर सकते।
भारत ने अधिकृत कश्मीर में हजारों युवाओं को मिसिंग पर्सन बनाया है। इस प्रकार, कश्मीर मुद्दे की यह मांग है कि पाकिस्तान के अंदर एक भी मिसिंग पर्सन न हो ताकि हम दुनिया के सामने भारत के घृणित चेहरे से नकाब हटाने के लिए बेहतर स्थिति में हो सकें।
अगर हमारे देश में हमारे अपने नागरिक भी लापता हैं, तो हम कश्मीर के लापता लोगों के मामले को दुनिया के सामने कैसे पेश कर सकते हैं। कई बार कश्मीर में फर्जी चुनाव कराकर भारत ने दुनिया को यह विश्वास दिलाने की कोशिश की है कि वहां लोकतांत्रिक प्रक्रिया चल रही है। अब, पाकिस्तान के भीतर भी, अगर चुनाव परिणाम में धांधली के आरोप हैं, तो यह कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तानी रूख के लिए हानिकारक है क्योंकि यह चीज़ पाकिस्तान को भारत की कतार में खड़ी करती है।
70 साल तक, भारत ने लोकतंत्र का ढोंग किया और कठपुतली शासकों के माध्यम से कश्मीरियों को नियंत्रित करने की कोशिश की। अब, अगर कठपुतलियों को पाकिस्तान में भी शासक बना दिया जाता है, तो वे कश्मीर के केस को आत्म विश्वास के साथ कैसे लड़ सकते हैं क्योंकि कठपुतलियाँ कठपुतलियाँ हैं चाहे भारत में हों या पाकिस्तान में।
इस प्रकार कश्मीर मुद्दे की मांग है कि पाकिस्तान में वास्तविक लोकतांत्रिक सरकारें स्थापित हों और जो लोग इसे चलाते हैं वे आत्मविश्वास के हथियार से लैस हों। मोदी सरकार ने 5 अगस्त को कश्मीरियों की इच्छा के खिलाफ जो किया था, उसके लिए बहाना यह था कि यह कश्मीरियों की भलाई के लिए था।
अब हम अगर दोनों तरफ के कश्मीरी नेताओं को ड्राइविंग सीट पर बिठान के बजाए अपनी नीतियां बना कर उन पर थोपते हैं तो भारत के सामने हमारी नैतिक पोज़ीशन कमज़ोर होगी। प्रधानमंत्री अगर कश्मीरियों के वकील हैं तो वकील कभी भी अपने मुवक्किल की इच्छा के बिना कोई काम नहीं करता।
मुक़द्दमा मुवक्किल बनाता है और वकील केवल उसे लड़ता है, इसलिए कश्मीरी नेतृत्व को ड्राइविंग सीट देने की आवश्यकता है। वह घोषणापत्र तैयार करे और पाकिस्तानी नेतृत्व उसे आगे बढ़ाए। हमारे अंदर चाहे जितना सदभावना हो, लेकिन अगर हम अपनी इच्छा कश्मीरियों पर थोपेंगे तो इससे भारत का काम आसान हो जाएगा। Q.A. साभार, जंग, पाकिस्तान